Tuesday, October 14, 2014
पिल्लू माझं करतंय काय...
Thursday, November 10, 2011
No sun's too bright for you
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Tuesday, September 20, 2011
hasat raha
Friday, September 25, 2009
eka mulaachi goshT
ती पाहताच माझी शाळा
हृदयी जो धडका भरला
जणू बांधची वाटे फुटला
उरलेला धीरची सुटला
कारण की आठवते मजला
काही घोटाळाची झाला
गणिती पाठची दिधला
बाईंनी सोडविण्याला
खेळ-बाहुल्ल्या मधुनी
करण्याचा राहूनी गेला
नाही कारण द्यायायाला
काही उपाय नाही उरला
उरलेला धीरची सुटला
तो इतिहासाचा तास
तिथे सनावळी अनेक
पण स्मरणी नसेची एक
पडे प्रसंग समोर बाका
वर्गी गनिमाचाची धोका
हुरहूर वाटे मजला
उरलेला धीरची सुटला
दिले व्याकरणाचे पाठ
म्हणी घोका हा गृहपाठ
दिसे गुरुजींची छडी ताठ
म्हणती डोके हे की माठ?
आता तिच्याशी माझी गाठ
कसे उत्तर द्यावे त्यांला
प्रश्न भलता अवघड बनला
उरलेला धीरची सुटला
तोवर मज आठवली
ती देशपांड्यांची मनुली
अन वळलेली पाऊले
अलगद अशी थबकली
थांबूनी तेथे क्षणभर
शाळेकडेची वळली
तशी छडीची नी बाईंची
आठवण मागे सरली
पण हाय घातची झाला
वर्गाच्या दाराशीच
गुरुजींची पडली गाठ
ते पटकन झाले पुसते
अभ्यास करितशी का रे?
का हालवितो मुंडी नुसते?
का मुखीचा चंबू झाला?
मग मार असाची मिळाला
वाटे नकोची कळो कुणाला!
पण मनात मनुची गोष्ट
करी छडीचा घावही मस्त
असे म्हणून आत मी शिरलो
नकळत बाईंशीची भिडलो
मग क्रुद्ध बाईंनी केला
माझ्या पितरांचा उद्धार
समोर दिसला मजला
दिवसाचा भागाकार
कोप-याकडे मी वळता
सभोवार नजर ती फिरली
नजरेसच नाही पडली
ती देशपांड्यांची मनुली
कुठूनी बुद्धी सुचली
आणि शाळेवर मी आलो
झाला मोठा पश्चाताप
वर मनुचा राग अमाप
धरता धरता अंगठे
अश्रूंचा झाला पात
बैठका ही काढीवल्या
अहो मोजूनी त्याही सात
सारी पोरं फिदीफिदी हसली
इथे आमची स्वारी रुसली
मनु होती काल म्हणाली
आणीन हलवा उद्या डब्यातूनी
आणि ताईनी दिली तर
दोन मोरपिसे वहीतूनी
आज ती आलेली नाही
हलवान पिसे ही नाही
वर होई कानांची अन्
तळहातांची लाही लाही
थोड्या अवधी नंतरी
बाकावरी मोर्चा आमचा बसला
तिथे पिटपाट जनू फुदकला
कानी लागोनी हळुची म्हणाला
छकुली पहा ती लेल्यांची
बोलाविती आहे तुजला
तोवरी छोट्या सुट्टीची
घंटा ती घणघणली
आज डब्यात जम्मत आहे
धावत येता म्हणाली छकुली
ती अन् मी अन् जनू
बाहेर पाणी प्याया निघालो
भागाकारातील बाकी
नकळत विसरून गेलो
नकळत विसरून गेलो
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Friday, May 29, 2009
khel khel mein thaa ek raajaa
खेल खेल में था एक राजा और एक उस की रानी,
अधूरा रह गया खेल रह गयी अधूरी एक कहानी
राजा कहता 'मैं तो हूँ तेरे प्रेम का प्यासा भूखा
जुड़ी हुयी है मेरे भाग्य से तेरे हाथ की रेखा'
यह सुन के क्यों आया रानी के नयनो में पानी?
रानी सोचके कहती देखते दूर दूर का तारा
'नहीं है मैंने सोचा हो कल दूजे नगर का फेरा'
किंतु राजा देर से समझा गूढ़ अटल यह बानी!
राजा पूछे उससे 'क्यों दो जीव मिलते हैं?
खिलने से पहले ही क्यों कुछ फूल बिखर जातें हैं?'
इन प्रश्नों का कोई उत्तर दे नहीं पायी रानी
क्या रानी ने छलके आंसू जाते नगर से कुछ दूर?
क्या राजा सह पाया सदमा देखके सपने चूर?
समय के साथ हवा में फहली एक उदास विरानी
खेल खेल में था इक राजा और एक उस की रानी,
अधूरा रह गया खेल रह गयी अधूरी एक कहानी
*** ***
राग : वृंदावनी सारंग (नादवेध)
मूल मराठी कविता के संगीत के आधार पर गायी जा सकती है |
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bhatukalichya khela madhali English translation interpretation
मंगेश पाडगांवकर
Monday, May 18, 2009
Sarvātmakā Sarveshwarā - English interpretation
गंगाधरा शिवसुंदरा
जे जे जगी जगते तया
माझे म्हणा, करूणा करा ||
आदित्य या तिमिरात व्हा
ऋग्वेद या हृदयात व्हा
सृजनत्व द्या, द्या आर्यता
अनुदारिता, दुरिताहरा ||
The prayer is an invocation and in the play it is rendered as the sanjeevani mantra. I have tried to interpret the poem in English prosaic form as it is the best I could arrive at. I am aware that it is difficult to call the lines typed below as verses. Never the less I have made every effort to be as conforming as possible to the original meaning of 'Sarvātmakā'.
Oh, you the one, who is infinitely wise
One, whom each mortal being worships
One, who bears holy Ganga upon his head
Oh my magnificent and divine Shiva, I pray to you.
I am a small element living in this universe
This universe is your kingdom and you are the ruler
You are the one who owns all its living creatures
I pray to you to look at them, have mercy at them
They may be doing good, they may be doing bad
Own them, and their ignorance, and save them.
Today the darkness has surrounded this universe
Oh Shiva, how can you see such sorrow and the plight?
I pray to you to be the Sun to show me the light
Enlighten me by teaching the principles and values of life
By the way of reinstating them in my heart
Give me the ability to do good and see good
Give me the courage, the strength and the power
And in turn make me a virtuous living being.
Oh, you the one who has conquered the evil
And the irrationals and the selfish and the cruel
Oh, you the one who has always sided with the good over the bad
I pray to you.
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शब्द: वि. वा. शिरवाडकर (कवी कुसुमाग्रज)
संगीत व स्वर: पं. जितेंद्र अभिषेकी
राग: भैरवी
नाटक: ययाति आणि देवयानी (१९६६)
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Wednesday, April 01, 2009
to kya baat ho...
इक सपना दिख जाये तो क्या बात हो ...
फूलों के संग इक खिलता चेहरा
जो मुस्कराये तो क्या बात हो ... ||
वो नाजूक हथेली आँगन हमारे
मेंहदी भर आये तो क्या बात हो ...
हाँथों में सजे खिलखिलाते कंगन
गुनगुनायें इधर भी तो क्या बात हो ... ||
परदानशीन का हटकर वो परदा
चाँद दिख जाये तो क्या बात हो ...
जालिम ये नजर इस प्यासे दिल के
पार हो जाये तो क्या बात हो ... ||
हाय... ये घने लहेराते गेसू
तनिक छाँव दिलाये तो क्या बात हो ...
इन लब्जों का झरना सुनसान बगीचा
जन्नत बनाए तो क्या बात हो ... ||
बल खाती जवानी सपने में मुझ को
हसीं सफर ले जाये तो क्या बात हो ...
ऐ माशूका तेरे ज़ानों पे आखरी
बीत जाये दो लम्हें तो क्या बात हो ... ||
पल भर का सपना पल भर के लिए
उनके सपने में आये तो क्या बात हो ...
पल भर की कहानी पल भर में कोई
उनको सुनाये तो क्या बात हो ... ||
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Monday, November 24, 2008
Celebration of Life - 'nahi punyachi mojani'
We don’t count any good deed
To no guilt we need to pay heed
Like the sacred waters of Ganga
Caressing the bed of rocks with a great speed.
We don’t involve us, nor do we indulge
No fear of disappointment, nor any grudge
Like the pollens traveling from flower to flower
Riding on the wind created by His power.
We’ve no form, no name, but the trance
Like the sky and its vast expanse
Incense stick to the blue fragrance
Filling His space with its pleasing advance.
We see us as the flowers offered to Him
Flowers celebrating their life at His feet
With a leap into the sacred water
Then in the womb of the Mother Earth, they enter
Till His next call, they will get sooner or later.
***
Original Marathi Poem
नाही पुण्याची मोजणी
नाही पापाची बोचणी
जिणे गंगौघाचे पाणी
कशाचा न लागभाग
कशाचा न पाठलाग
आम्ही हो फुलांचे पराग
आम्हा नाही नाम-रूप
आम्ही आकाश स्वरूप
जसा निळा निळा धूप
पुजेतल्या पानाफुला
मृत्यू सर्वांग सोहळा
धन्य निर्माल्याची कळा
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गीत : बा. भ. बोरकर
संगीत : पं. जितेंद्र अभिषेकी
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Musical rendering of the poem by Pt. Jitendra Abhisheki
Monday, September 29, 2008
jeevan
*** *** ***
जीवन एक सुंदर गाणं असतं
गाणार्याचा सूर लागायचा अवकाश की
सुखातील व दु:खानंतरच्या सुखातील अनुभूतीच्या
तंद्रीत घटकाभर हरवून जाणं असतं |
जीवन एक सुंदर गाणं असतं
कधी तलत मेहमूदचे अंतरंगी भिडणारे आर्त सूर
कधी किशोर रफीचं धुंद प्रीतकथन
अशा हिंदोळणार्या बहराचं येणं जाणं असतं |
जीवन एक सुंदर गाणं असतं
नुसतंच ऐकावं की तुम्ही खुलून गावं
हा तुमचा संभ्रम टाळण्यासाठी बनलेलं
शोलेमधल्या अमिताभचं गंमतशीर नाणं असतं |
जीवन एक सुंदर गाणं असतं |
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Friday, August 22, 2008
pahile quiz (first quiz)
पहिलं क्वीझ
आकाशात वीज
पावसात भीज
खाटेवर नीज
पहिलं क्वीझ
भीतीचे बीज
घोकम्पट्टी
वर्षाचे लीज
पहिलं क्वीझ *
मरतोय मीच
मनीच होई
कष्टाचं चीज
पहिलं क्वीझ #
उगाच झीज
जुन्या ब्रेडला
नवीन चीज
पहिलं क्वीझ
मेंदूची झीज
कशास करशी
उगाच टीज
पहिलं क्वीझ
समोर चंगीझ
आणि वर म्हणे
बी ऍट इझ
पहिलं क्वीझ
प्रश्न सोळा
फोड भोपळा
इति चंगीझ
पहिलं क्वीझ
मोकळं रान
मोडे मान
फुटे काळीज
पहिलं क्वीझ *
प्रश्न मीच
धडपडतोय अजून
दूर क्षितीज
पहिलं क्वीझ
कड कड टप टप
तड तड ठप ठप
सांडे वीज
पहिलं क्वीझ
यस यस नो नो
यस यस नो नो
यस इट इज!
पहिलं क्वीझ
आकाशात वीज
पावसात भीज
खाटेवर नीज
***
* सहाय्य : अभिजीत कुलकर्णी
# सहाय्य: गिरीश कुलकर्णी
***
Thursday, June 12, 2008
raahi
आज फिर मौसम सर्द है,
फैला हुआ कोहरा है,
दिल का वह पहचाना सा दर्द,
आज भी गहरा है।
फिर गुजर रहा हूँ, उन गलियों से,
दिला रही हैं याद, जो मुझे,
वे चंद पल,
जिन में खो दिया था मैं ने ख़ुद को,
वह डगर जहाँ से, देखी थी मैं ने झांकी,
एक उजले सूरज की।
अब पहूँच गया हूँ,
गली के उस पार जहाँ मौजूद है,
अभी तक एक गवाह,
इस बरगद की छाँव में,
आसमान छूती शाखाओं तले,
हुआ था मुझे, एक धुंधला एहसास।
मिल गयी थी वह मंजील,
थी जिस की, कब से तलाश।
आज चलते हुए जब मैं,
गुजर चुका हूँ, उस बरगद के पास से
क्यों लगता हैं, कि कोई पुकार रहा है।
और मुझे पूछ रहा है,
'क्या यह वही जिंदगी है?
जो हुआ करती थी पहले,
जब लगते थे दिल में
हर पल उम्मीद के मेले?
और तब जब तूम इस दर्द से
थे अनजान, और अकेले ...'
तभी सुनाई दे रही है,
कही से एक आवाज,
जो बता रही है मुझे कि
वह तो बात थी अतीत की,
तूम तो कर रहे थे सफर।
राही का गुमराह होना,
यह दोष नहीं तेरा है,
दिला दे ख़ुद को, यह एहसास अब,
आज भी, यह सफर अधूरा है।
दोपहर की धूप में भटकता हुआ,
शाम से पहले,
पहूँच पाऊं अपनी मंजील तक,
यही हौसला मेरा है।
पर मुझे पता है,
दिल का वह पहचाना सा दर्द
आज भी गहरा है।
Thursday, June 05, 2008
Divinity in Disguise
| From Picnic to Ann... |
One day I found myself alongside an Eagle,
There with ordinary creatures he was to mingle.
Soon I found that the spite had not touched him,
Nor his gleaming eyes had become pale and dim.
He had to share 'the small world' with so many others.
But he asked me to click my device and squeaked, "Who bothers!"
I soon noticed that he had managed to keep his grace.
He was the divinity in disguise, and nothing else!
Thursday, July 12, 2007
रात अकेली थी
दिया बुझ गया था
कोई आ के कानों में मेरे
जो भी चाहे
कह रहा था...
धरती सो रही थी
आसमां सो रहा था
हर डगर सो रही थी
हर गली सो रही थी
हर सेहेर सो रहा था
मेहमां सो रहे थे
मेजबां सो रहे थे
चोर सो रहे थे
पुलीस सो रही थी
वही नहीं, सरकार भी सो रही थी
बैल सो रहे थे
गाडी सो रही थी
बिल्ली सो रही थी
चुहे सो रहे थे और
कुत्ता भी सो रहा था
फूला चमन सो रहा था
उजडा चमन सो रहा था
ये सो रहे थे
वो सो रहे थे
सब सो रहे थे
हम खूशनसीब थे
के हम भी सो रहे थे
तब महसूस हुआ कि
रात अकेली थी
दिया बुझ गया था
कोई आ के कानों में मेरे
जो भी चाहे
कह रहा था...
***
Wednesday, February 07, 2007
आठवण
काय असते आठवण?
पाण्याचा ओलावा की अमृताचा गोडवा,
अश्रुंची धारा की झोंबणारा वारा,
पावसाच्या थंड गारा की हा आसमंत सारा! काय असते आठवण?
नुकतेच गिरीश ओकांच्या छंदाबद्दल खुद्द त्यांच्या तोंडूनच ऐकलं होते. ते म्हणे फोनवर आलेल्या काव्यात्मक निरोपांना तश्याच प्रकारे उत्तर देतात. छंद आहे तो त्यांचा. मग काय!
इकडे मनास स्फूरण चढले आणि तिकडे हाती पेन चढले, शब्द कसे एकामागून एक लाईनीमधून आले... पहा तुम्हाला आवडतात का.
आठवण..
काय असते आठवण..
दारात उभी राहून पहायची वाट?
की सर्रकन येणा-या काट्याचा थरथराट..
काय असते आठवण..
पावलोपावली चुकणारा काळजाचा ठोका?
की मागेपुढे होणारा मनाचा झोका..
काय असते आठवण..
झेपावू पहाणा-या मनाचा झंझावात?
की तळमळत तळमळत काढलेली रात..
काय असते आठवण..
का असते ती अर्ध्या मिटलेल्या डोळ्यात?
का ती असते तडफड अडकलेल्या मासळीची जाळ्यात..
फारच गोंधळ शब्दांचा आणि इकडून तिकडून गोळा केलेल्या उपमांचा, येव्हढे सगळे केले तर मला आता वाटतयं गुपचूप करावी थोडी चोरी..
तर मग,
आठवणीबद्दल आठवता उपमा साठी आमची येईल
म्हणून म्हणतो,
दुधगांवकरांनी घ्यावी मंगेश पाडगांवकरांची स्टाईल
मग वाचा पुढे..
शेवटी वाटते,
आठवण म्हणजे आठवण म्हणजे आठवण असते
दशसहस्र क्षणांची व सहस्र प्रतिमांची अंतरी साठवण असते!
***