यह दौलत भी ले लो, यह शौहरत भी ले लो भले छीन लो मुझ से मेरी जवानी मगर मुझ को लौटा दो बचपन का सावन वह कागज़ की कश्ती, वह बारीश का पानी
मुहल्ले की सब से पुरानी निशानी वह बुढिया जिसे बच्चे कहते थे नानी वह नानी की बातों में परियों का डेरा वह चेहरे की झुरियों में सदियों का फेरा भुलाएँ नहीं भूल सकता है कोई वह छोटी सी रातें, वह लंबी कहानी
कडी धूप में अपने घर से निकलना वह चिडिया, वह बुलबूल, वह तितली पकडना वह गुडिया की शादी पे लडना झगडना वह झूलों से गिरना, वह गिर के संभलना वह पीतल के छल्लों के प्यारे से तोहफे वह टूटी हुयी चूडियों की निशानी
कभी रेत के ऊँचे टीलों पे जाना घरौंदे बनाना, बनाकर मिटाना वह मासूम चाहत की तसवीर अपनी वह ख्वाबों खिलौनों की जागीर अपनी ना दुनिया का गम था, न रिश्तों के बंधन बडी खूबसूरत थी वह जिंदगानी
यह दौलत भी ले लो, यह शौहरत भी ले लो भले छीन लो मुझ से मेरी जवानी मगर मुझ को लौटा दो बचपन का सावन वह कागज़ की कश्ती, वह बारीश का पानी
तेरे खुशबू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे? प्यार में डूबे हुये ख़त मैं जलाता कैसे? तेरे हाथों के लिखे ख़त मैं जलाता कैसे?
जिन को दुनिया की निगाहों से छुपाये रखा, जिन को इक ऊम्र कलेजे से लगाए रखा, दिन जिन को जिन्हें इमान बनाए रखा ...
जिन का हर लब्ज मुझे याद पानी की तरह, याद थे मुझ को जो पैगाम-ए-जुबानी की तरह, मुझ को प्यारे थे जो अनमोल निशानी की तरह ...
तूने दुनिया की निगाहों से जो बचकर लिखे, साल-हा-साल मेरे नाम बराबर लिखे, कभी दिन में तो कभी रात को उठकर लिखे ...
तेरे खुशबू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे ... प्यार में डूबे हुये ख़त मैं जलाता कैसे ... तेरे हाथों के लिखे ख़त मैं जलाता कैसे ... तेरे ख़त आज मैं गंगा में बहा आया हूँ, आग बहते हुये पानी में लगा आया हूँ।।
*** *** शायर : स्वर : जगजीत सिंह
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*** *** ग़ज़ल, नज्म, Revival With Jagjit Singh, 1993